पुरानी आदत हो तुम
आठ बजे होने वाली सुबह हो तुम जो अब छः बजे ही हो जाती है दो घंटे का ये फासला ,सच कहूं तो तुम्हें मुझसे दूर , बहुत दूर ले गया है चाय की चुस्की हो तुम जो, ना जाने कब ,काॅफी ने गटक लिया जिसमें ,मैं कितना ही शक्कर मिला लूं तुम्हारी पत्ती बिन ,अधूरी ही रहती है सुबह वो मेरे हाथों की कोई Indian expressअखबार हो तुम या ,अखबार की कोई खबर जिसे सुबह पेपरवाला दे तो जाता है पर कभी मैं पढ़ता हूं ,तो कभी मेरे bed पर पड़ी रहती है मेरे चेहरे पर सजी, बेवजह मुस्कान हो तुम जिसे शायद वजहों ने मारना शुरू कर दिया है और मुझे इन वजहों पर अब गुस्सा भी नहीं आता मेरे छज्जे पर बैठी इक चिड़िया हो तुम जो आज बैठे -बैठे यही सोच रही है,किस आंधी ने उसका आशियाना उड़ा लिया आंखों में कैद , कोई ख्वाब हो तुम जिसको हकीकत के मेरे कई आंसू बहा चुके हैं जो तुम्हारे जाने के बाद , दुल्हन की तरह दिखती तो है पर अब सजती नहीं है कंधे पर बैठी इक नादानी हो तुम जिसे जिम्मेदारियों ने इस तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है कि इन आंखों के पुतलियों में अब...