पुरानी आदत हो तुम
आठ बजे होने वाली सुबह हो तुम
जो अब छः बजे ही हो जाती है
दो घंटे का ये फासला ,सच कहूं तो
तुम्हें मुझसे दूर , बहुत दूर ले गया है
चाय की चुस्की हो तुम
जो, ना जाने कब ,काॅफी ने गटक लिया
जिसमें ,मैं कितना ही शक्कर मिला लूं
तुम्हारी पत्ती बिन ,अधूरी ही रहती है
सुबह वो मेरे हाथों की कोई Indian expressअखबार हो तुम
या ,अखबार की कोई खबर
जिसे सुबह पेपरवाला दे तो जाता है
पर कभी मैं पढ़ता हूं ,तो कभी मेरे bed पर पड़ी रहती है
मेरे चेहरे पर सजी, बेवजह मुस्कान हो तुम
जिसे शायद वजहों ने मारना शुरू कर दिया है
और मुझे इन वजहों पर अब गुस्सा भी नहीं आता
मेरे छज्जे पर बैठी इक चिड़िया हो तुम
जो आज बैठे -बैठे यही सोच रही है,किस आंधी ने उसका आशियाना उड़ा लिया
आंखों में कैद , कोई ख्वाब हो तुम
जिसको हकीकत के मेरे कई आंसू बहा चुके हैं
जो तुम्हारे जाने के बाद , दुल्हन की तरह दिखती तो है
पर अब सजती नहीं है
कंधे पर बैठी इक नादानी हो तुम
जिसे जिम्मेदारियों ने इस तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है
कि इन आंखों के पुतलियों में अब काले गढ्ढे हो गये हैं
बाजार में चहलकदमी करने वाली कोई भीड़ हो तुम
हां भीड़ ही, तो हो
जिसे मैंने चीख -चीख कर अपने पास रखना चाहा था , कभी
वहीं भीड़ जहां तुम्हें पहचानना, मेरे लिए अब मुश्किल होता है
हर शाम मेरे साथ बैठने वाली,बालकनी की फुर्सत हो तुम
जिसे दिन - भर की थकान, मुझसे छीन लेता है
और ये थकान , तुझे मुझसे दूर ले जाता है
शायद उससे भी ज्यादा दूर , जितना तुम ने बना लिया
मेरे किसी व्यंजन का स्वाद हो तुम
जिसे जुबां पहचानना बंद कर चुकी है
जुबां की ये बेरुखी तुम्हें भूल चुकी है
मगर तुम हो , तो कोई पुरानी आदत
वहीं आदत जिसने , तुम्हें किसी का हर पहर होते देखा है
तुम्हें किसी के साथ सोते देखा है
वहीं पुरानी आदत
जिसके लिए मैं हर रोज तरसता हूं
उसी को छोड़ देता हूं
जिसे पाने की जद्दोजहद कभी कम नहीं की
जिसको पाने में , मैं खुद को कितना ही तोड़ देता हूं
फिर मैं सोचता हूं , मैं भी तुम्हारी आदत बन जाऊंगा
पर ये कभी नहीं होगा , मैं जानता हूं
मगर हो , तुम कोई पुरानी आदत
मजबूरन बनी
नई आदत की एक भीड़
जिसे मैं छोड़ आया हूं
वहीं पुरानी आदत हो तुम
~ Kumar Nitish



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